करणीय मेत्त सुत्त
मैत्री भाव फैलाने के विषय में उपदेश (मैत्री सूत्र)
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स
उन भगवान, अरहत, सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार है!
जिस किसी कुशल (दक्ष) व्यक्ति को उस परम शांत 'अमृत निर्वाण' पद को प्राप्त करने की इच्छा हो, उसमें ये गुण होने चाहिए: उसे समर्थ होना चाहिए, सीधा (ईमानदार) होना चाहिए, पूरी तरह से सरल व निष्कपट होना चाहिए। साथ ही, उसे बड़ों और गुरुओं की आज्ञा मानने वाला (सुवच), मृदु (कोमल स्वभाव वाला) और विनम्र (अहंकार रहित) होना चाहिए।
उसे संतोषी होना चाहिए और जिसका भरण-पोषण आसानी से हो सके (दूसरों पर बोझ न बने)। उसे कम काम वाला (अल्पकृत्य) व्यक्ति होना चाहिए और जीवन शैली हल्की-फुल्की (सादा) होनी चाहिए। उसकी इंद्रियां शांत होनी चाहिए। उसमें उचित विवेक (बुद्धिमत्ता) होना चाहिए। उसे ढीठ (असभ्य/अशिष्ट) नहीं होना चाहिए और गृहस्थ कुलों (दाता परिवारों) में आसक्त नहीं होना चाहिए।
बुद्धिमान लोग जिस कारण से दूसरों की निंदा करते हैं, उसे वैसी छोटी सी गलती भी नहीं करनी चाहिए। (उसे यह भावना करनी चाहिए): 'सभी प्राणी सुखी हों! निर्भय और सुरक्षित हों! सभी का मन प्रसन्न और शांत हो!'
जो कोई भी जीवित प्राणी हैं—चाहे वे डरने वाले (त्रस) हों या निडर (स्थावर/अरहंत) हों—वे सभी, और चाहे वे लंबे शरीर वाले हों, विशाल शरीर वाले हों, मध्यम शरीर वाले हों, छोटे हों, बहुत सूक्ष्म हों या स्थूल (मोटे) शरीर वाले हों,
चाहे वे दिखाई देते हों या दिखाई न देते हों, चाहे वे दूर रहते हों या पास, चाहे वे जन्म ले चुके हों या अभी जन्म की ओर जा रहे हों (जो प्राणी गर्भ में या अंडे में हैं)—उन सभी प्राणियों का जीवन सुखी हो!
कोई किसी को धोखा न दे! कोई किसी का कहीं भी अपमान न करे! क्रोध या द्वेष (नफरत) के कारण कोई दूसरे के दुःख की कामना न करे!
जिस प्रकार एक माँ अपने इकलौते पुत्र की रक्षा अपने प्राणों की बाजी लगाकर करती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों के प्रति अपरिमित (असीम) मैत्री भाव बढ़ाना चाहिए।
ऊपर, नीचे और तिरछे (चारों दिशाओं में) बिना किसी बाधा के, बिना वैर और बिना शत्रुता के, संपूर्ण जगत के प्रति असीम मैत्री भाव फैलाना चाहिए।
चाहे खड़े हों, चलते हों, बैठे हों या लेटे हों, जब तक नींद न आए (जागते रहें), इस मैत्री-स्मृति को बनाए रखना चाहिए। बुद्ध शासन में इसे ही 'ब्रह्म-विहार' (श्रेष्ठ जीवन) कहा गया है।
जो व्यक्ति मिथ्या दृष्टि (गलत धारणाओं) में नहीं पड़ता, जो शीलवान है और 'दर्शन' (सम्यक दृष्टि/सत्य के ज्ञान) से युक्त है, यदि वह काम-भोगों (इंद्रिय सुखों) के प्रति अपनी आसक्ति को दूर कर लेता है, तो वह निश्चित रूप से फिर कभी गर्भवास में नहीं आता। (अनागामी: मृत्यु के बाद शुद्धावास ब्रह्मलोक में उत्पन्न होकर वहीं परिनिर्वाण प्राप्त करते हैं।)
मेत्त सुत्त समाप्त।
साधु! साधु!! साधु!!!