Yamaka Vaggo
युगल गाथाओं का भाग
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स
उन भगवान, अरहत, सम्यक सम्बुद्ध को नमस्कार है!
जीवन की हर स्थिति में मन ही मूल है। मन ही प्रधान (श्रेष्ठ) है। सब मन से ही उत्पन्न होता है। यदि कोई दूषित (बुरे) मन से कुछ कहता है या करता है, तो दुख उसका पीछा वैसे ही करता है, जैसे गाड़ी का पहिया उसमें जुते हुए बैल के पीछे चलता है।
जीवन की हर स्थिति में मन ही मूल है। मन ही प्रधान है। सब मन से ही उत्पन्न होता है। यदि कोई प्रसन्न (शुद्ध) मन से कुछ कहता है या करता है, तो सुख उसका पीछा वैसे ही करता है, जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया।
"उसने मुझे गाली दी, मुझे मारा, मुझे हराया, मेरा सब लूट लिया" - जो लोग इस तरह सोचते हुए क्रोध की गांठ बांध लेते हैं, उनका वैर (नफरत) कभी शांत नहीं होता।
"उसने मुझे गाली दी, मुझे मारा, मुझे हराया, मेरा सब लूट लिया" - जो लोग ऐसा नहीं सोचते और अपने भीतर क्रोध उत्पन्न नहीं होने देते, उनका वैर शांत हो जाता है।
इस संसार में वैर (नफरत) से वैर कभी शांत नहीं होता। अवैर (प्रेम/मैत्री) से ही वैर शांत होता है। यह इस संसार का सनातन नियम (धर्म) है।
"इस तरह कलह (झगड़े) करने से हम ही नष्ट हो जाएंगे" - यह बात कलह करने वाले लोग नहीं जानते। लेकिन जो यह जानते हैं कि इन झगड़ों से हमारा ही नाश होगा, उनके कलह शांत हो जाते हैं।
जो केवल शुभ (सुखद) दृष्टि से चीजों को देखता रहता है, जिसकी इंद्रियां असंयत (बश में नहीं) हैं, जो भोजन की मात्रा (अर्थ) को नहीं जानता, वह आलसी और कम वीर्य (उत्साह) वाला व्यक्ति है। उसे मार वैसे ही गिरा देता है जैसे तेज हवा किसी कमजोर पेड़ को।
जो अशुभ (यथार्थ/असुंदर) दृष्टि रखता है (राग को दूर करने के लिए), जिसकी इंद्रियां संयमित हैं, जो भोजन की मात्रा को जानता है, वह श्रद्धालु है। वह आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने के लिए वीर्य (प्रयास) आरम्भ कर दिया है। मार उसे हिला भी नहीं सकता, जैसे तेज हवा एक चट्टानी पर्वत को नहीं हिला सकती।
जो कोई स्वयं क्लेशों (पाप) के मैल से युक्त होकर काषाय वस्त्र (चीवर) धारण करता है, जिसमें इंद्रिय दमन और सत्य नहीं है, वह (अरहंत ध्वज रूपी) काषाय वस्त्र धारण करने के योग्य कतई नहीं है।
जिसने क्लेशों के मैल को त्याग दिया (वमन कर दिया) है, जो शीलवान है, समाधि से युक्त है, इंद्रिय दमन से युक्त है और सत्य बोलता है, वास्तव में वही काषाय वस्त्र के लिए सच्चा अधिकारी है।
इस संसार में कुछ निसार (सारहीन) चीजें हैं। कुछ लोगों को वे सारवान (महत्वपूर्ण) लगती हैं। शील, समाधि, प्रज्ञा जैसी सारवान चीजें उन्हें निसार लगती हैं। वे मिथ्या (गलत) विचारों के शिकार हैं। उन्हें कभी सारवान वस्तु प्राप्त नहीं होती।
सम्यक दृष्टि के कारण, जिनके पास सम्यक संकल्प है, वे लोग शील, समाधि, प्रज्ञा जैसी सारवान चीजों को सारवान के रूप में ही जानते हैं। वे निसार को निसार के रूप में जानते हैं। इसलिए वे सारवान 'निर्वाण' का बोध प्राप्त करते हैं।
यदि घर की छत गलत तरीके से छाई गई हो, तो बारिश होने पर उस छत से घर में पानी टपकता है। समथ-विपश्यना भावना से विकसित न किया गया मन भी वैसा ही है। उस मन के भीतर राग प्रवेश करता है।
यदि घर की छत सही तरीके से छाई गई हो, तो बारिश होने पर उस छत से घर में पानी नहीं टपकता। समथ-विपश्यना भावना से विकसित किया गया मन भी वैसा ही है। उस मन के भीतर राग प्रवेश नहीं करता।
पाप करने वाला व्यक्ति इस लोक में भी शोक करता है। परलोक में भी वह शोक करता है। वह दोनों लोकों में शोक करता है। अपने द्वारा किए गए मलिन अकुशल कर्मों को देखकर वह शोक करता है, पीड़ित होता है।
इस लोक में भी पुण्य करने वाला प्रसन्न होता है। परलोक में भी पुण्य करने वाला प्रसन्न होता है। वह दोनों लोकों में प्रसन्न होता है। अपने द्वारा किए गए पवित्र कुशल कर्मों को देखकर वह प्रसन्न होता है, आनंदित होता है।
पाप करने वाला व्यक्ति इस लोक में भी पश्चाताप करता है। परलोक में भी वह पश्चाताप करता है। वह दोनों लोकों में पछताता है। "अरे! मैंने पाप किया" कहकर वह पछताता है। नरक (अपाय) में जन्म लेने के बाद वह बहुत अधिक पछताता है।
अच्छी तरह पुण्य-कर्म करने वाला व्यक्ति इस लोक में भी खुश होता है। परलोक में भी वह खुश होता है। वह दोनों लोकों में खुश होता है। "मैंने पुण्य किया" सोचकर वह खुश होता है। सुगति (स्वर्ग) में जन्म लेने के बाद वह बहुत अधिक खुश होता है।
प्रमादी व्यक्ति चाहे दूसरों को कितना भी धर्म उपदेश दे, पर यदि वह स्वयं उस धर्म का पालन नहीं करता, तो वह दूसरों की गायों को पालने वाले ग्वाले जैसा है। उसे श्रमण जीवन के मार्ग-फल का स्वामित्व नहीं मिलता।
धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति चाहे धर्म का उपदेश कम ही क्यों न दे, लेकिन यदि वह उस धर्म में स्थित होकर राग, द्वेष, मोह को दूर करता है, और धर्म के ज्ञान से दुखों से मुक्त चित्त बना लेता है, और इस लोक या परलोक में किसी भी चीज में आसक्त नहीं होता, तो वही भिक्षु उत्तम मार्ग-फल का स्वामी होता है।
साधु! साधु!! साधु!!!
(पहला यमक वग्ग समाप्त हुआ।)